CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Poetry (Kavya Khand)
कविता का मूल भाव (Theme/Core Message):
'पर्वत प्रदेश में पावस' (पहाड़ी क्षेत्र में वर्षा ऋतु) नामक यह कविता प्रकृति के पल-पल बदलते रूप (Changing phases) का बहुत ही सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है। कवि कहते हैं कि 'पावस ऋतू' (वर्षा ऋतु/Rainy Season) में पहाड़ों का दृश्य जादू की तरह बदलता है। कभी धूप, कभी अचानक काले बादल, कभी मूसलाधार बारिश और कभी धुंध (कोहरा) छा जाती है। प्रकृति 'जादूगर' की तरह अपना खेल दिखाती है। इस कविता में मानवीकरण अलंकार (Personification) का बहुत ही ख़ूबसूरती से प्रयोग किया गया है।
शब्दार्थ: पावस रितु = वर्षा ऋतु (Monsoon season), परिवर्तित = बदलता हुआ, मेखलाकार = करधनी के आकार का (girdle/waistband shaped, like a mountain range), सहस्र = हज़ारों (Thousands), दृग-सुमन = पुष्प रूपी आँखें (Flower-like eyes), अवलोक = देख रहा है, महाकार = विशाल आकार (Huge shape), ताल = तालाब (Pond/Lake), दर्पण = आईना (Mirror)।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि पहाड़ी इलाके (पर्वत प्रदेश) में वर्षा ऋतु का समय है। इस समय
प्रकृति हर पल (पल-पल) अपना रूप (सूरत/कपड़े) बदल रही है; कभी बारिश तो कभी धूप निकल आती
है।
वहाँ एक बहुत बड़ा और विशाल पर्वत खड़ा है, जिसका आकार किसी 'मेखला' (करधनी/कमरबंद) के
समान गोल और घुमावदार है।
उस विशाल पर्वत पर हज़ारों फूल (सुमन) खिले हुए हैं, जिन्हें कवि पर्वत की
हज़ारों आँखें (दृग) कहते हैं। इन हज़ारों आँखों को फाड़कर (खोलकर) वह विशाल पर्वत नीचे फैले बहुत
बड़े और साफ़ तालाब (Lake) के आईने (Mirror) में अपनी महानता और अपने विशाल रूप (महाकार) को
लगातार (बार-बार) निहार रहा है (देख रहा है)। वह तालाब भी पर्वत के चरणों में पल रहा है जो एकदम दर्पण की
तरह पारदर्शी (Transparent) है।
शिल्प-सौंदर्य (Poetic Devices): 'दृग-सुमन' (पुष्प रूपी नेत्र) में रूपक अलंकार (Metaphor)। 'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' में 'प' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार (Alliteration)। 'दर्पण-सा' में उपमा अलंकार (Simile)। संपूर्ण पद में मानवीकरण अलंकार (Personification) है (पर्वत को क मनुष्य की तरह आईना देखते हुए दिखाया गया है)।
शब्दार्थ: गिरि = पर्वत (Mountain), गौरव = महानता/यश (Glory), मद में = मस्ती में (In joy/intoxication), निर्झर = झरने (Waterfalls), उर = हृदय (Heart/Chest), उच्चाकांक्षाओं = ऊँची इच्छाओं (High Ambitions), तरुवर = ऊँचे पेड़ (Tall trees), नीरव नभ = शांत आकाश (Silent empty sky), अनिमेष = बिना पलक झपकाए (Unblinking), अटल = स्थिर (Steady), चिंतापर = चिंतित (Worried)।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि पर्वत से झाग (Foam) से भरे हुए जो सफ़ेद झरने
(Waterfalls) नीचे गिर रहे हैं, वे 'मोतियों की सुंदर लड़ियों' (Pearl
necklaces) के समान लग रहे हैं। ये झरने जब 'झर-झर' की आवाज़ करते हुए गिरते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे ये
पर्वत (गिरि) की महानता और यश (गौरव) के गीत (Songs) गा रहे हों। इनके मधुर संगीत को सुनकर
शरीर की नस-नस में एक नई उमंग और मस्ती (उत्तेजना) भर जाती है।
दूसरी ओर, पर्वत के चौड़े 'हृदय' (उर/Chest) पर उगे हुए ऊँचे-ऊँचे पेड़ (तरुवर) भी बहुत
रहस्यमयी लग रहे हैं। इन पेड़ों को देखकर ऐसा लगता है मानो इनके मन में 'आकाश को छूने' की बहुत ऊँची और गहरी
इच्छाएँ (उच्चाकांक्षाएँ/ Ambitions) हैं। इसीलिए ये पेड़ बिल्कुल 'स्थिर' (अटल) होकर,
बिना पलक झपकाए (अनिमेष) शांत नीले आकाश (नीरव नभ) की ओर लगातार झाँक रहे हैं। लेकिन इनके
मौन में ऐसा लगता है जैसे मन में कोई 'गहरी चिंता' भी घर किए हुए है।
शब्दार्थ: भूधर = पर्वत (Mountain), अपार = विशाल, पारद = पारा (Mercury/White metallic cloud-like substance), पर = पंख (Wings), रव-शेष = केवल आवाज़ का बाकी रह जाना (Only sound left), भू = पृथ्वी (Earth), अम्बर = आकाश (Sky), धरा = धरती (Ground), सभय = डर के मारे (Fearful), शाल = 'शाल' के ऊँचे पेड़ (Reverberated trees), ताल = तालाब, जलद-यान = बादल रूपी विमान (Cloud-chariot), विचर-विचर = घूम-घूम कर, इन्द्रजाल = जादू का खेल (Magic trick)।
भावार्थ: बारिश के मौसम में अचानक प्रकृति का रूप बदलता है। चारों तरफ बहुत गहरी
धुंध (Thick Fog/सफ़ेद बादल) छा जाती है।
इस धुंध को देखकर ऐसा लगता है मानो वह विशाल पर्वत (भूधर) पारे (मर्करी) के समान चमकीले 'सफ़ेद
पंख' (पारद के पर) फड़फड़ाकर कहीं आकाश में उड़ गया हो! (क्योंकि पर्वत धुंध के कारण दिखाई देना
बंद हो गया है)।
कोहरे (Fog) के कारण जब कुछ भी नहीं दिखाई देता, तो ऐसा लगता है जैसे आकाश (अम्बर) धरती (भू) पर
टूट पड़ा हो (तेज़ मूसलाधार बारिश होने लगी है)। झरनों और बारिश की केवल 'आवाज़'
(रव-शेष) सुनाई दे रही है, पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा है।
इस भयंकर बारिश और तूफ़ान को देखकर ऐसा लगता है जैसे 'शाल के विशाल पेड़' भी डर के मारे (सभय)
धरती (धरा) में धँसकर छिप गए हों।
चारों तरफ धुंध (Fog/कोहरे) को देखकर ऐसा लगता है जैसे नीचे तालाब (ताल) में आग लग गई हो और
उसमें से तेज़ 'धुआँ' उठ रहा हो।
अंत में कवि कहते हैं कि वर्षा के देवता (इन्द्र) अपने 'बादल रूपी विमान'
(जलद-यान) में बैठकर इस पहाड़ी इलाके में जादूगर (Magician) की तरह अपना
रहस्यमयी जादू (इन्द्रजाल) का खेल खेल रहे हैं, जिससे प्रकृति पल-पल में अपना चमत्कारी रूप बदल रही है।
शिल्प-सौंदर्य (Poetic Devices): 'पारद के पर', 'रव-शेष रह गए हैं' में अनुप्रास अलंकार। 'जलद-यान' (बादल रूपी विमान) में रूपक अलंकार (Metaphor)। पूरी कविता में अत्यंत सजीव और 'चित्रात्मक' (Visual/Imagery) शैली का प्रयोग है।
प्रश्न 1: पर्वत को 'मेखलाकार' (करधनी के आकार का) और उसकी 'हज़ारों आँखें' किसे क्यों कहाँ गया है?
उत्तर: 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता में:
1. मेखलाकार: पर्वत (पहाड़) शृंखला का फैलाव बिल्कुल गोल और घुमावदार है, जो महिलाओं की
कमर में पहने जाने वाले आभूषण 'करधनी' (मेखला/Waistband) के समान विशाल और सुंदर लग रहा है, इसलिए उसे
'मेखलाकार' कहा गया है।
2. हज़ारों आँखें: पर्वत के ऊपर अनगिनत 'रंग-बिरंगे फूल' खिले हुए हैं। कवि
(सुमित्रानंदन पंत) ने उन फूलों को पर्वत की 'हज़ारों पुष्प-रूपी आँखें' (दृग-सुमन) कहा है,
जिनसे वह पहाड़ नीचे फैले तालाब रूपी आईने (दर्पण) में अपने विशाल रूप को लगातार निहार (देख) रहा है।
प्रश्न 2: पहाड़ों से गिरते हुए 'झरने' किसके समान लग रहे हैं और वे क्या कर रहे हैं?
उत्तर: झंझावात और बारिश में पहाड़ों से झाग (सफ़ेद पानी) भर-भर कर तेज़ी से
नीचे गिरते हुए झरने (निर्झर) बहुत ही सुंदर 'मोतियों की लड़ियों' (Pearl strands) के समान
चमकते हुए लग रहे हैं।
ऐसा लगता है मानो वे झरने गिरते समय 'झर-झर' की मधुर आवाज़ करके 'पर्वत की महानता' (गिरि का गौरव) का
गुणगान कर रहे हैं और गीत गा रहे हैं। उनकी मस्ती भरी आवाज़ सुनने वाले व्यक्ति की नस-नस में एक नई उमंग और
उत्तेजना (Excitement) भर देती है।
प्रश्न 3: पर्वत के ऊपर उगे 'शाल के ऊँचे पेड़' क्या सोच रहे हैं और वे 'सभय' (डर के मारे) धरती में क्यों धँस जाते हैं?
उत्तर: पर्वत के हृदय (सीने) पर उगे हुए 'शाल के ऊँचे-ऊँचे पेड़' ऐसा लगता
है मानो वे 'गहरी और ऊँची महत्त्वाकांक्षाओं' (High Ambitions) से भरे हों और 'आकाश को
चूमने' की इच्छा से एकटक-मौन (शांत) होकर आकाश की ओर झाँक रहे हैं। (यह मनुष्य के आगे बढ़ने की इच्छा का भी
प्रतीक है)।
परन्तु जब अचानक भयंकर बारिश होने लगती है, आसमान से मूसलाधार पानी बरसने लगता है और पूरी 'धुंध और
कोहरा' (Fog) छा जाता है; तब वे विशाल और अभिमानी 'शाल के पेड़' भी (प्रकृति के भयंकर रूप
को देखकर) डर के मारे (सभय) धरती में धँसकर छिप जाते हैं। अर्थात जब मुसीबत आती है, तो
बड़े-बड़ों का अभिमान टूट जाता है।
प्रश्न 4: "यों जलद-यान में विचर-विचर, था इन्द्र खेलता इन्द्रजाल" - इस पंक्ति का क्या आशय है?
उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि वर्षा ऋतु के समय पहाड़ों पर प्रकृति का
'जादू' पल-पल बदलता है। कभी धूप, कभी काले बादल, कभी धुंध और कोहरा।
कवि कल्पना करते हैं कि मानो वर्षा के देवता (इन्द्र) अपने 'बादल रूपी विमान'
(जलद-यान) में हवा में घूम-घूम (विचर) रहे हैं और वे अपनी माया से कोई 'जादू का खेल'
(इन्द्रजाल) दिखा रहे हैं, जिससे प्रकृति एक मदारी की तरह पल-पल में अपना वेश (रूप) बदल रही
है। यह प्रकृति के सौंदर्य और उसके अप्रत्याशित (Unpredictable) स्वभाव का मानवीकरण है।